क्यों बिहार की 38 आरक्षित सीटों पर राष्ट्रीय पार्टियां अपने सहयोगियों पर निर्भर हैं

क्यों बिहार की 38 आरक्षित सीटों पर राष्ट्रीय पार्टियां अपने सहयोगियों पर निर्भर हैं
आख़िर गठबंधन धर्म है मजबूरी… या दलित वोटों की लूट की मजबूर राजनीति?

अंकिता की रिपोर्ट बिहार विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 38 सीटों पर सियासत अपने चरम पर है…
पर बड़ा सवाल ये —
क्या बीजेपी और कांग्रेस ने एससी कोटे की सीटों की लगाम क्षेत्रीय दलों को सौंप दी है?

एनडीए में सबसे आगे जेडीयू 15 सीटों पर, जबकि भाजपा 11 पर लड़ रही है।
हम और लोजपा-आर को भी अहम हिस्सेदारी मिली है…
यानी दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति, सहयोगियों के सहारे!

वहीं महागठबंधन में राजद 20 सीटों के साथ सबसे आगे,
कांग्रेस को मिली 11 सीटें, और भाकपा-माले को 6 सीटों पर दांव खेलने का मौका।

लेकिन असली सवाल इससे भी बड़ा —
क्या बिहार में दलितों का प्रतिनिधित्व सिर्फ दो-तीन उपजातियों में सिमट कर रह गया है?
जबकि राज्य की 19.6% से ज्यादा एससी आबादी — 22 अलग-अलग उपजातियों में बंटी है,
फिर भी राजनीति का केंद्र सिर्फ पासवान, रविदास और मुसहर ही क्यों?

आख़िर गठबंधन धर्म है मजबूरी… या दलित वोटों की लूट की मजबूर राजनीति?
2025 के नतीजे साफ कर देंगे —
दलितों का भरोसा किसके साथ जाएगा?
और असली प्रतिनिधित्व किसे मिलेगा?

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