ममता बनर्जी पर जगन्नाथ का ‘कोप’! दैतापति के बयान से गरमाई सियासत

ममता बनर्जी पर जगन्नाथ का ‘कोप’! दैतापति के बयान से गरमाई सियासत

जगन्नाथ मंदिर विवाद को लेकर एक बार फिर पश्चिम बंगाल की राजनीति गरमा गई है। पुरी की रथ यात्रा के दौरान श्रीजगन्नाथ मंदिर के दैतापति द्वारा दिया गया बयान अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। दैतापति ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी सरकार ने पुरी मंदिर के धर्माचार्यों की सलाह नहीं मानी और भगवान जगन्नाथ की परंपराओं की अनदेखी की। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान किसी का अहंकार स्वीकार नहीं करते और इसी कारण उनकी सरकार सत्ता से बाहर हो गई।

दैतापति के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। विपक्षी दल इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा मुद्दा बता रहे हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीतिक बयानबाज़ी करार दे रही है।

दरअसल, विवाद की जड़ मई 2025 में पश्चिम बंगाल के दीघा में पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर बनाए गए मंदिर से जुड़ी है। मंदिर के उद्घाटन के बाद से ही धार्मिक परंपराओं और मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को लेकर कई धर्माचार्यों ने आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा शास्त्रों के अनुसार केवल लकड़ी की होनी चाहिए, जबकि दीघा मंदिर में स्थापित प्रतिमा को लेकर सवाल उठाए गए।

दैतापति ने अपने बयान में कहा कि धार्मिक परंपराओं की अनदेखी कभी स्वीकार नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि भगवान जगन्नाथ से जुड़े नियम सदियों से चले आ रहे हैं और उनका पालन करना सभी के लिए आवश्यक है। उन्होंने यह भी दोहराया कि “धाम” केवल चार ही होते हैं और किसी अन्य धार्मिक स्थल के साथ इस शब्द का प्रयोग उचित नहीं माना जाता।

अपने संबोधन के दौरान दैतापति ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की भी सराहना की। उनका कहना था कि सरकार बनने के बाद उन्होंने दीघा मंदिर के साथ जुड़े “धाम” शब्द को हटाने का निर्णय लिया और धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया। हालांकि यह बयान भी राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।

दीघा जगन्नाथ मंदिर को लेकर पहले भी कई धार्मिक संगठनों और पुरी मंदिर से जुड़े सेवायतों ने आपत्ति जताई थी। उनका आरोप था कि मंदिर निर्माण और धार्मिक अनुष्ठानों में पारंपरिक नियमों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार और मंदिर प्रबंधन का कहना रहा कि श्रद्धालुओं की सुविधा और धार्मिक आस्था को ध्यान में रखते हुए मंदिर का निर्माण कराया गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दे अक्सर चुनावी राजनीति का हिस्सा बनते रहे हैं। ऐसे में दैतापति का यह बयान आने वाले समय में राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप को और तेज कर सकता है।

फिलहाल इस बयान पर तृणमूल कांग्रेस की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। दूसरी ओर धार्मिक संगठनों का कहना है कि वे केवल परंपराओं के संरक्षण की बात कर रहे हैं और इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक मान्यताओं और राजनीतिक बयानों के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। ऐसे संवेदनशील मामलों में सभी पक्षों को जिम्मेदारी के साथ अपनी बात रखनी चाहिए ताकि सामाजिक सौहार्द प्रभावित न हो।

दैतापति के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। विपक्षी दल इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा मुद्दा बता रहे हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीतिक बयानबाज़ी करार दे रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक मान्यताओं और राजनीतिक बयानों के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। ऐसे संवेदनशील मामलों में सभी पक्षों को जिम्मेदारी के साथ अपनी बात रखनी चाहिए ताकि सामाजिक सौहार्द प्रभावित न हो।

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