61 साल पुराना अधूरा गीत बना सदाबहार, रफी की आवाज और मीना-राजकुमार की केमिस्ट्री ने रचा इतिहास
छू लेने दो नाज़ुक होठों को हिंदी सिनेमा का एक ऐसा सदाबहार गीत है, जिसे आज भी संगीत प्रेमी उतनी ही शिद्दत से सुनते हैं जितना इसके रिलीज के समय सुना जाता था। वर्ष 1965 में आई फिल्म ‘काजल’ का यह रोमांटिक गीत अपनी मधुर धुन, गहरे शब्दों और मोहम्मद रफी की भावपूर्ण आवाज के कारण अमर हो गया। दिलचस्प बात यह है कि यह गीत शुरुआत में एक पूरा गीत नहीं, बल्कि केवल दो शेरों के रूप में लिखा गया था। बाद में संगीतकार रवि की पहल पर इसे फिल्म का गीत बनाया गया और अधूरा रहने के बावजूद इसने हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में अपनी अलग पहचान बना ली।
फिल्म ‘काजल’ उस दौर की चर्चित फिल्मों में शामिल थी। इसमें मीना कुमारी और राज कुमार की जोड़ी ने दर्शकों का दिल जीत लिया था। फिल्म के एक विशेष दृश्य के लिए महान शायर साहिर लुधियानवी ने दो खूबसूरत शेर लिखे थे। इन पंक्तियों में प्रेम, संवेदनशीलता और भावनाओं की गहराई साफ झलकती थी। जब संगीतकार रवि ने इन शेरों को पढ़ा तो उन्हें लगा कि इन शब्दों में एक यादगार गीत बनने की पूरी क्षमता है।
रवि ने इन दो शेरों पर ऐसी धुन तैयार की, जिसने गीत को एक नई पहचान दी। धुन तैयार होने के बाद इसे फिल्म में शामिल करने का फैसला किया गया। रिकॉर्डिंग की तैयारियां शुरू हुईं और गीत को मोहम्मद रफी की आवाज में रिकॉर्ड करने की योजना बनी। रफी साहब की गायकी उस दौर में रोमांटिक गीतों की पहचान मानी जाती थी और उनकी आवाज ने इस गीत में ऐसी मिठास घोली कि यह सीधे श्रोताओं के दिलों तक पहुंच गया।
बताया जाता है कि रिकॉर्डिंग के समय फिल्म के निर्माता चाहते थे कि गीत में एक और अंतरा जोड़ा जाए ताकि यह पारंपरिक फिल्मी गीत की तरह अधिक लंबा हो सके। इसके लिए साहिर लुधियानवी से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उस समय वे उपलब्ध नहीं हो सके। समय की कमी और फिल्म की शूटिंग की आवश्यकताओं को देखते हुए गीत को उसी रूप में रिकॉर्ड कर लिया गया, जिसमें केवल दो शेर थे।
यही अधूरापन बाद में इस गीत की सबसे बड़ी खासियत बन गया। जहां अधिकांश फिल्मी गीत कई अंतरों के साथ रिकॉर्ड किए जाते थे, वहीं ‘छू लेने दो नाज़ुक होठों को’ अपनी संक्षिप्तता के बावजूद भावनात्मक प्रभाव छोड़ने में सफल रहा। संगीत प्रेमियों का मानना है कि गीत का अधूरा रह जाना ही उसकी खूबसूरती को और बढ़ा देता है।
फिल्म में इस गीत को मीना कुमारी और राज कुमार पर फिल्माया गया था। दोनों कलाकारों की अभिनय शैली और स्क्रीन पर उनकी सहज केमिस्ट्री ने गीत को और भी यादगार बना दिया। मीना कुमारी के भावपूर्ण अभिनय और राज कुमार के प्रभावशाली व्यक्तित्व ने इस रोमांटिक गीत को एक अलग ऊंचाई दी।
संगीतकार रवि का संगीत और साहिर लुधियानवी के शब्दों का मेल हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर की पहचान माना जाता है। इस गीत में भी दोनों की रचनात्मकता साफ दिखाई देती है। वहीं मोहम्मद रफी की आवाज ने इसे कालजयी बना दिया। आज भी रेडियो, संगीत कार्यक्रमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर यह गीत बड़ी संख्या में सुना जाता है।
‘काजल’ फिल्म भी अपने समय की सफल फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म की कहानी, संगीत और कलाकारों के अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा था। हालांकि समय के साथ फिल्म से ज्यादा इसके गीतों ने लोगों के दिलों में स्थायी जगह बना ली और उनमें ‘छू लेने दो नाज़ुक होठों को’ सबसे लोकप्रिय गीतों में शामिल है।
आज, रिलीज के 61 साल बाद भी यह गीत नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बना हुआ है। पुराने फिल्मी गीतों के शौकीन इसे हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन रोमांटिक गीतों में गिनते हैं। इसकी लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि अच्छे शब्द, मधुर संगीत और भावपूर्ण गायकी समय की सीमाओं से परे जाकर भी लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहती है।

