Sawan Ko Aane Do: जब गानों ने तय किया फिल्म की कहानी का ढांचा
Sawan Ko Aane Do: जब गानों ने तय किया फिल्म की कहानी का ढांचा
सावन का मौसम आते ही पुराने हिंदी फिल्मी गीतों की मधुर यादें ताजा हो जाती हैं। ऐसे ही सदाबहार गीतों से सजी फिल्म है ‘सावन को आने दो’, जिसमें अरुण गोविल, जरीना वहाब और रीता भादुड़ी ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। यह फिल्म अपने संगीत, भावनात्मक कहानी और ग्रामीण सौंदर्य के लिए आज भी दर्शकों के बीच खास जगह रखती है।
लेकिन इस फिल्म से जुड़ा एक ऐसा दिलचस्प किस्सा सामने आया है, जो हिंदी सिनेमा में शायद ही कभी सुनने को मिलता है। बताया जाता है कि फिल्म की कहानी गानों के क्रम के आधार पर लिखी गई थी।
अरुण गोविल के ‘राम’ बनने से पहले की यादगार फिल्म
‘सावन को आने दो’ उस दौर में रिलीज हुई थी, जब अरुण गोविल को टीवी पर भगवान राम के रूप में देशव्यापी पहचान नहीं मिली थी। बाद में रामानंद सागर की ‘रामायण’ ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया, लेकिन उससे पहले यह फिल्म उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है।
फिल्म का निर्देशन और निर्माण ताराचंद बड़जात्या ने किया था, जो पारिवारिक और संगीत प्रधान फिल्मों के लिए जाने जाते थे।
राजकमल का गाने सुनाने का अनोखा तरीका
फिल्म के संगीतकार राजकमल के बेटे सूर्या राजकमल ने एक बातचीत में इस फिल्म से जुड़ा रोचक किस्सा साझा किया। उनके अनुसार, राजकमल किसी भी फिल्म की सिटिंग में जाने से पहले गानों का एक विशेष फोल्डर तैयार करते थे।
उस फोल्डर में यह पहले से तय होता था:
- कौन सा गीत सबसे पहले सुनाया जाएगा
- कौन सा गीत उसके बाद आएगा
- किस भाव और स्थिति में गीत रखा जाएगा
यानी राजकमल के लिए गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि पूरी फिल्म की भावनात्मक यात्रा का हिस्सा होते थे।
पहले सुनाया गया ‘चांद जैसे मुखड़े पे’
सूर्या राजकमल के मुताबिक, ‘सावन को आने दो’ की सिटिंग में सबसे पहले ‘चांद जैसे मुखड़े पे’ गीत सुनाया गया था। उस समय फिल्म का कार्यकारी नाम भी ‘चांद जैसे मुखड़े पे’ रखा गया था।
गीत सुनने के बाद ताराचंद बड़जात्या ने प्रसिद्ध लेखक राही मासूम रजा को बुलाया और उनसे कहा कि गाने जिस क्रम में सुनाए गए हैं, कहानी भी उसी क्रम में विकसित की जाए।
गानों का क्रम बदला नहीं गया
यह इस फिल्म की सबसे अनोखी बात थी। आमतौर पर फिल्मों में कहानी पहले लिखी जाती है और बाद में उसके अनुसार गाने जोड़े जाते हैं। लेकिन ‘सावन को आने दो’ में प्रक्रिया उलटी थी।
यह तय किया गया कि:
- गीतों का क्रम नहीं बदलेगा
- हर गीत कहानी में उसी स्थान पर रहेगा, जहां वह पहले से तय किया गया था
- कहानी का भावनात्मक प्रवाह गीतों के अनुसार आगे बढ़ेगा
इस तरह फिल्म के गीत केवल मनोरंजन का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि उन्होंने पूरी पटकथा की संरचना तय करने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
राही मासूम रजा की भूमिका
राही मासूम रजा हिंदी और उर्दू साहित्य के प्रतिष्ठित लेखक थे। उन्होंने कई फिल्मों और टीवी धारावाहिकों के लिए लेखन किया।
‘सावन को आने दो’ में उन्हें पहले से तय गीतों के भाव, स्थिति और क्रम को ध्यान में रखते हुए कहानी को इस तरह गढ़ना था कि गीत और कथा एक-दूसरे से स्वाभाविक रूप से जुड़े रहें।
यही कारण है कि फिल्म देखते समय उसके गीत कहानी से अलग महसूस नहीं होते, बल्कि कहानी के भावनात्मक विस्तार का हिस्सा लगते हैं।
फिल्म का नाम कैसे बदला?
शुरुआत में फिल्म का नाम ‘चांद जैसे मुखड़े पे’ रखा गया था, लेकिन बाद में इसे बदलकर ‘सावन को आने दो’ कर दिया गया। नया शीर्षक फिल्म के संगीत और सावन से जुड़े भावनात्मक वातावरण के अधिक करीब माना गया।
यह शीर्षक बाद में इतना लोकप्रिय हुआ कि फिल्म का नाम सुनते ही उसके गीत स्वतः याद आने लगते हैं।
आज भी क्यों याद किए जाते हैं इसके गीत?
फिल्म के गीत आज भी रेडियो, संगीत कार्यक्रमों और सावन विशेष प्लेलिस्ट में सुने जाते हैं। इसकी वजह केवल धुनें नहीं, बल्कि गीतों का कहानी से गहरा जुड़ाव भी है।
संगीतकार राजकमल ने लोकधुनों, शास्त्रीयता और भावनात्मक सरलता का ऐसा मेल बनाया, जिसने फिल्म को समय के साथ और भी यादगार बना दिया।
हिंदी सिनेमा के लिए क्यों है यह खास उदाहरण?
‘सावन को आने दो’ का यह किस्सा हिंदी फिल्म निर्माण की उस परंपरा को दिखाता है, जिसमें संगीत को कहानी की आत्मा माना जाता था। आज के दौर में जहां कई फिल्मों में गाने अलग से जोड़े जाते हैं, वहां यह फिल्म इस बात का उदाहरण है कि गीत किस तरह पूरी कथा संरचना को दिशा दे सकते हैं।

