Nepal Flood: DNA सैंपलिंग के बाद अज्ञात शवों को दफनाया जा रहा, ऐसे होगी पहचान
Nepal Flood: DNA सैंपलिंग के बाद अज्ञात शवों को दफनाया जा रहा, ऐसे होगी पहचान
Nepal Flood के बीच राहत और बचाव अभियान के दौरान बरामद किए जा रहे शवों की पहचान प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। भीषण बाढ़ और मलबे के बीच कई शव ऐसी स्थिति में मिले हैं, जिनकी तुरंत पहचान करना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में नेपाल प्रशासन ने अज्ञात शवों की पहचान भविष्य के लिए सुरक्षित रखने के लिए DNA सैंपलिंग के बाद उन्हें दफनाने की प्रक्रिया शुरू की है।
रिपोर्ट के मुताबिक, शनिवार दोपहर तक 100 से अधिक अज्ञात शवों की DNA प्रोफाइलिंग पूरी की जा चुकी थी। प्रशासन की कोशिश है कि शवों को लंबे समय तक मुर्दाघर में रखने के बजाय सुरक्षित तरीके से दफनाया जाए, लेकिन उनकी पहचान से जुड़ी सभी जरूरी जानकारी रिकॉर्ड में सुरक्षित रखी जाए।
शवों को दिया जा रहा है विशेष नंबर
अज्ञात शवों को विशेष बैग में पैक करने के बाद उन्हें एक पहचान संख्या दी जा रही है। शव को जहां दफनाया जाएगा, वहां भी उसी पहचान संख्या के साथ साइन बोर्ड लगाया जाएगा।
इसके अलावा प्रशासन दफन स्थल की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड कर रहा है। दफन स्थान की जियो-टैगिंग भी की जा रही है, ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर संबंधित शव के स्थान को आसानी से खोजा जा सके।
इस व्यवस्था से प्रशासन के पास प्रत्येक अज्ञात शव से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सुरक्षित रहेगी।
DNA के जरिए होगी लापता लोगों की पहचान
अगर किसी परिवार का सदस्य बाढ़ के बाद लापता है और बाद में परिवार शव की तलाश में प्रशासन के पास पहुंचता है, तो संबंधित परिजन का DNA सैंपल लिया जाएगा।
स्वास्थ्य विभाग उस DNA सैंपल का मिलान पहले से सुरक्षित किए गए अज्ञात शवों के DNA प्रोफाइल से करेगा। अगर DNA मैच हो जाता है, तो शव की पहचान संख्या के आधार पर उसके दफन स्थल की जानकारी हासिल की जा सकेगी।
इसके बाद पुलिस और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की मदद से शव को दफन स्थल से निकालने और परिजनों को सौंपने की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।
संक्रमण का खतरा भी बड़ी वजह
नेपाल प्रशासन के सामने एक और बड़ी चुनौती शवों को लंबे समय तक सुरक्षित रखना है। बाढ़ और मलबे में मिले कई शव बेहद खराब स्थिति में बताए जा रहे हैं। ऐसे शवों को लंबे समय तक मुर्दाघर में रखने से संक्रमण और स्वास्थ्य संबंधी खतरा बढ़ सकता है।
इसी वजह से प्रशासन ने सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से शवों को दफनाने की प्रक्रिया अपनाई है। साथ ही DNA सैंपल और अन्य रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जा रहे हैं, ताकि भविष्य में परिवारों को अपने लापता परिजनों की पहचान करने में मदद मिल सके।
तस्वीर और वीडियो भी किए जा रहे रिकॉर्ड
सिर्फ DNA सैंपलिंग ही नहीं, बल्कि शवों से जुड़ी पूरी जानकारी रिकॉर्ड करने की कोशिश की जा रही है। विशेष नंबर, दफन स्थल की तस्वीरें, वीडियो और जियो-टैगिंग इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
इसका उद्देश्य यह है कि अगर कई दिनों या महीनों बाद कोई परिवार अपने लापता सदस्य की तलाश में सामने आता है, तो प्रशासन के पास उसकी पहचान करने के लिए पर्याप्त जानकारी मौजूद हो।
परिवारों के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था
प्राकृतिक आपदा के दौरान कई बार बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की वजह से शवों की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में DNA प्रोफाइलिंग एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तरीका साबित हो सकता है।
नेपाल में अपनाई जा रही यह व्यवस्था एक तरफ स्वास्थ्य संबंधी जोखिम को कम करने की कोशिश है, वहीं दूसरी तरफ अज्ञात शवों की पहचान की संभावना को भी सुरक्षित रखती है।
परिवारों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी शव को दफनाए जाने के बाद भी उसकी पहचान से जुड़ी जानकारी रिकॉर्ड में मौजूद रहेगी।
राहत और बचाव अभियान के बीच चुनौती
नेपाल में बाढ़ के बाद राहत और बचाव अभियान लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। मलबे, तेज पानी और प्रभावित इलाकों में पहुंच की मुश्किलों के बीच बचाव दल शवों और लापता लोगों की तलाश कर रहे हैं।
जैसे-जैसे मलबे को हटाया जा रहा है, वैसे-वैसे और शव बरामद होने की आशंका बनी हुई है। ऐसे में प्रशासन के लिए शवों की पहचान, सुरक्षित रख-रखाव और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से पूरा करना जरूरी हो गया है।
पहचान होने के बाद क्या होगा?
अगर किसी अज्ञात शव का DNA किसी लापता व्यक्ति के परिवार के DNA से मैच करता है, तो प्रशासन रिकॉर्ड में दर्ज पहचान संख्या के जरिए उस शव के दफन स्थल तक पहुंच सकेगा।
इसके बाद आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी कर पुलिस की मौजूदगी में शव को निकाला जा सकता है और परिवार को सौंपा जा सकता है।
इस पूरी व्यवस्था का मकसद यही है कि अज्ञात शवों को दफनाने के बावजूद उनकी पहचान हमेशा के लिए खत्म न हो।
निष्कर्ष
नेपाल में Nepal Flood के बीच अज्ञात शवों की पहचान प्रशासन के सामने बेहद संवेदनशील चुनौती बनी हुई है। DNA सैंपलिंग, विशेष पहचान संख्या, दफन स्थल की जियो-टैगिंग और फोटो-वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए प्रशासन भविष्य में इन शवों की पहचान की संभावना बनाए रखना चाहता है।
यह व्यवस्था एक तरफ संक्रमण के खतरे को कम करने में मदद कर सकती है, वहीं दूसरी तरफ उन परिवारों के लिए उम्मीद बनाए रखती है जो बाढ़ के बाद अपने लापता परिजनों की तलाश कर रहे हैं।

