Retired IAS Father Property Dispute: पिता को मानसिक बीमार बताकर फ्लैट हड़पने की कोशिश, बॉम्बे HC ने बेटे पर लगाया ₹5 लाख जुर्माना

­रिटायर्ड IAS पिता को मानसिक बीमार बताकर फ्लैट हड़पने की कोशिश, बॉम्बे हाईकोर्ट ने बेटे पर लगाया ₹5 लाख जुर्माना

 

मुंबई: मुंबई में संपत्ति विवाद से जुड़ा एक मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने 78 वर्षीय रिटायर्ड IAS अधिकारी के बेटे की याचिका खारिज कर दी। बेटे ने अपने पिता को मानसिक रूप से बीमार बताते हुए उनकी मानसिक स्थिति की जांच कराने की मांग की थी। अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद बेटे की याचिका खारिज करने के साथ उस पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

 

मामला पिता और बेटे के बीच फ्लैट को लेकर चल रहे विवाद से जुड़ा था। अदालत ने माना कि कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल संपत्ति विवाद में बढ़त हासिल करने और बुजुर्ग पिता को परेशान करने के लिए किया गया।

 

पिता को मानसिक रूप से बीमार बताने की कोशिश

 

जानकारी के मुताबिक, 54 वर्षीय जितेंद्र मेघ का अपने 78 वर्षीय पिता के साथ फ्लैट को लेकर विवाद चल रहा था। इसी विवाद के दौरान बेटे ने Mental Healthcare Act, 2017 की धारा 105 का सहारा लिया।

 

बेटे ने जुलाई 2024 के एक पुराने मेडिकल सर्टिफिकेट को आधार बनाया। इसके जरिए उसने अपने पिता की मानसिक स्थिति की जांच कराने की मांग की थी। उसका दावा था कि पिता की मानसिक स्थिति ऐसी है, जिसके आधार पर उनकी क्षमता पर सवाल उठाया जा सकता है।

 

हालांकि, अदालत ने उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड और मामले की परिस्थितियों को देखने के बाद बेटे की दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

 

मेडिकल रिकॉर्ड में क्या था?

 

मेडिकल रिकॉर्ड में पिता की स्वास्थ्य स्थिति से जुड़ी कुछ परेशानियों का उल्लेख था। रिकॉर्ड के मुताबिक, डायबिटीज और इंसुलिन से जुड़ी स्थिति के कारण उन्हें कभी-कभी अस्थायी रूप से भूलने, पसीना आने या भ्रम जैसी समस्याएं हो सकती थीं।

 

बेटे ने इन्हीं लक्षणों को आधार बनाकर पिता को मानसिक रूप से अक्षम साबित करने की कोशिश की। लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि ये समस्याएं शारीरिक और अस्थायी प्रकृति की थीं और इन्हें मानसिक बीमारी के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

 

बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या कहा?

 

मामले की सुनवाई बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस नितिन जामदार और जस्टिस मिलिंद जाधव की खंडपीठ ने की। अदालत ने मानसिक स्वास्थ्य कानून के उद्देश्य पर भी जोर दिया।

 

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Mental Healthcare Act का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है। इसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति के खिलाफ निजी विवाद में अनुचित तरीके से नहीं किया जा सकता।

 

अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल पिता को परेशान करने और संपत्ति से जुड़े विवाद में फायदा हासिल करने के लिए किया गया।

 

बेटे की याचिका खारिज, फ्लैट से बेदखली का आदेश

 

हाईकोर्ट ने बेटे की याचिका को खारिज कर दिया। इसके साथ ही उसे पिता के फ्लैट से बेदखल करने का आदेश भी दिया गया।

 

अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए बेटे पर 5 लाख रुपये का हर्जाना लगाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह रकम सीधे बुजुर्ग पिता को दी जाए।

 

फैसले में अदालत ने कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को गंभीरता से लिया और माना कि कानून का इस्तेमाल संपत्ति पर कब्जे के लिए नहीं किया जा सकता।

 

बुजुर्गों के अधिकारों पर महत्वपूर्ण संदेश

 

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला बुजुर्गों के अधिकारों और कानूनी प्रावधानों के दुरुपयोग को लेकर महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। परिवार के भीतर संपत्ति को लेकर विवाद कई बार गंभीर कानूनी लड़ाई में बदल जाते हैं, लेकिन अदालत ने साफ किया कि किसी कानून का इस्तेमाल निजी या संपत्ति विवाद में गलत तरीके से नहीं किया जा सकता।

 

यह फैसला खासतौर पर इस बात को रेखांकित करता है कि किसी बुजुर्ग व्यक्ति की अस्थायी शारीरिक स्वास्थ्य समस्या को आधार बनाकर उसे मानसिक रूप से अक्षम बताने की कोशिश को सिर्फ संपत्ति विवाद के संदर्भ में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

 

फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश के बाद बेटे की याचिका खारिज हो चुकी है और उसे फ्लैट से बेदखल करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही 5 लाख रुपये की राशि पिता को देने का आदेश भी अदालत ने दिया है। इस फैसले को बुजुर्गों की गरिमा, अधिकारों और कानून के जि

म्मेदार इस्तेमाल से जोड़कर देखा जा रहा है।

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