Delhi Police Facial Recognition: जंतर-मंतर पर पुलिस की टेक्नोलॉजी का बड़ा सवाल, 25 लोग जेल में थे फिर भी प्रदर्शन में दिखे
Delhi Police Facial Recognition: जंतर-मंतर पर पुलिस की टेक्नोलॉजी का बड़ा सवाल, 25 लोग जेल में थे फिर भी प्रदर्शन में दिखे
नई दिल्ली में दिल्ली पुलिस की Facial Recognition Technology को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस के Facial Recognition System (FRS) ने बड़ी संख्या में लोगों के चेहरों को पुलिस रिकॉर्ड से मैच किया। पुलिस के मुताबिक, इस सिस्टम के जरिए 2,873 ऐसे लोगों की पहचान की गई जिनके आपराधिक रिकॉर्ड बताए गए थे। लेकिन बाद की जांच में सामने आया कि इनमें से कम से कम 25 लोग उस समय जेल में बंद थे।
इस खुलासे ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भीड़ की पहचान करने के लिए इस्तेमाल की जा रही Facial Recognition Technology वास्तविक परिस्थितियों में कितनी सटीक है और इसके आधार पर मिलने वाले परिणामों पर कितना भरोसा किया जा सकता है।
जंतर-मंतर प्रदर्शन में क्या हुआ?
रिपोर्ट के मुताबिक, जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने Facial Recognition System का इस्तेमाल किया था। पुलिस के अनुसार 20 से 26 जुलाई के बीच सिस्टम ने 2,873 लोगों को फ्लैग किया।
इस तकनीक का उद्देश्य कैमरों में रिकॉर्ड हुए चेहरों को पुलिस के डेटाबेस में मौजूद तस्वीरों से मिलाना होता है। किसी व्यक्ति का चेहरा सिस्टम में मौजूद तस्वीर से मिलता-जुलता पाए जाने पर उसे संभावित मैच के रूप में फ्लैग किया जा सकता है।
लेकिन Indian Express की जांच में पुलिस, जेल और अदालत के रिकॉर्ड की तुलना की गई तो कम से कम 25 ऐसे लोगों के मामले सामने आए, जिन्हें सिस्टम ने प्रदर्शन में मौजूद बताया, जबकि रिकॉर्ड के मुताबिक वे उस समय जेल में थे। इनमें हत्या, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म और बच्चों के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर मामलों में आरोपी बताए गए लोग भी शामिल थे।
जेल में बंद व्यक्ति प्रदर्शन में कैसे दिखा?
इस मामले ने Facial Recognition System की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया है। उदाहरण के तौर पर, रिपोर्ट में एक ऐसे व्यक्ति का मामला सामने आया जिसे पुलिस के सिस्टम ने जंतर-मंतर पर मौजूद बताया, जबकि जेल रिकॉर्ड के मुताबिक वह उस समय तिहाड़ जेल में बंद था।
एक अन्य मामले में भी सिस्टम ने एक व्यक्ति को प्रदर्शन स्थल पर पहचान लिया, लेकिन रिकॉर्ड के अनुसार वह पहले से ही जेल में था। ऐसे मामलों से यह स्पष्ट होता है कि केवल Facial Recognition System से मिले मैच को किसी व्यक्ति की मौके पर मौजूदगी का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
पुलिस ने क्या कहा?
दिल्ली पुलिस ने पहले भी स्पष्ट किया है कि Facial Recognition System का मैच अपने-आप में किसी व्यक्ति की पहचान या उसके प्रदर्शन स्थल पर मौजूद होने का अंतिम प्रमाण नहीं है।
पुलिस के मुताबिक, सिस्टम से किसी चेहरे की पहचान होने के बाद संबंधित व्यक्ति का फील्ड वेरिफिकेशन किया जाता है। यानी तकनीक से मिले संभावित मैच के बाद पुलिस स्तर पर यह जांच की जानी चाहिए कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में उस स्थान पर मौजूद था या नहीं।
यही वजह है कि इस मामले में तकनीक के साथ-साथ मानव स्तर पर सत्यापन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
80 प्रतिशत Accuracy पर भी सवाल
दिल्ली पुलिस ने 2022 में एक RTI के जवाब में बताया था कि उसके सिस्टम में करीब 80 प्रतिशत की Accuracy को “positive” मैच के तौर पर माना जाता था। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सिस्टम द्वारा किया गया मैच किसी व्यक्ति की पहचान का अंतिम और कानूनी प्रमाण है।
Facial Recognition Technology की Accuracy कई चीजों पर निर्भर कर सकती है। कैमरे का एंगल, रोशनी, तस्वीर की गुणवत्ता, चेहरे पर मास्क या अन्य बाधाएं और जिस डेटाबेस से तुलना की जा रही है, इन सभी का परिणाम पर असर पड़ सकता है।
AI और Surveillance पर बढ़ती बहस
Facial Recognition Technology का इस्तेमाल सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए दुनियाभर में बढ़ रहा है। भारत में भी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां अलग-अलग मामलों में इस तकनीक का इस्तेमाल करती रही हैं।
लेकिन जंतर-मंतर का यह मामला एक महत्वपूर्ण सवाल सामने लाता है—अगर किसी व्यक्ति को सिस्टम गलत तरीके से किसी अपराध या प्रदर्शन से जोड़ दे तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
तकनीक का इस्तेमाल अपराध की जांच को तेज और प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन इसके परिणामों को बिना स्वतंत्र सत्यापन के अंतिम सत्य मानना जोखिम भरा हो सकता है।
भरोसे और जवाबदेही की जरूरत
जंतर-मंतर मामले में कम से कम 25 लोगों के जेल में होने के बावजूद Facial Recognition System द्वारा उन्हें प्रदर्शन में फ्लैग किए जाने की रिपोर्ट ने तकनीक की Accuracy, निगरानी व्यवस्था और डेटा के इस्तेमाल को लेकर बहस तेज कर दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी तकनीक के इस्तेमाल के साथ स्पष्ट नियम, नियमित ऑडिट, मानव सत्यापन और जवाबदेही की व्यवस्था जरूरी है। खासकर तब, जब Facial Recognition के किसी मैच के आधार पर किसी व्यक्ति पर पुलिस कार्रवाई या आपराधिक संदेह पैदा हो सकता है।
इस पूरे मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाली तकनीक कितनी सटीक होनी चाहिए और गलत पहचान की स्थिति में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी।

