Satya Niketan Building Collapse: 100 हाथियों जितना वजन नहीं सह पाई 56 साल पुरानी इमारत, जानिए कैसे हुआ सत्य निकेतन हादसा

Satya Niketan Building Collapse: 100 हाथियों जितना वजन नहीं सह पाई 56 साल पुरानी इमारत, जानिए कैसे हुआ सत्य निकेतन हादसा

नई दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला छात्र PG इमारत के अचानक ढहने से राजधानी में सनसनी फैल गई। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास हुई इस घटना में अब तक 7 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। हादसे के बाद कई घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया और मलबे से लोगों को बाहर निकाला गया। पांच मंजिला यह इमारत मुख्य रूप से छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल हो रही थी। हादसे ने दिल्ली में छात्र PG और हॉस्टल के रूप में इस्तेमाल हो रही पुरानी इमारतों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

56 साल पुरानी थी इमारत

सत्य निकेतन की यह इमारत करीब 55 से 56 साल पुरानी बताई जा रही है। AP की रिपोर्ट के अनुसार, इमारत की उम्र कम से कम 55 साल थी और इसे हाल ही में आंशिक रूप से रेनोवेट किया गया था। अगस्त में इसे दोबारा छात्रों के लिए खोला गया था। हादसे के समय यहां बड़ी संख्या में छात्र रह रहे थे।

पुरानी इमारतों में समय के साथ कंक्रीट, सरिया, पिलर और नींव की क्षमता प्रभावित हो सकती है। यदि ऐसे ढांचे पर बाद में अतिरिक्त मंजिलें बनाई जाएं या मूल डिजाइन से अधिक भार डाला जाए, तो जोखिम और बढ़ जाता है।

सत्य निकेतन हादसे में भी शुरुआती जांच का फोकस इमारत की उम्र के साथ-साथ उसके निर्माण, इस्तेमाल और हाल में किए गए काम पर है।

ग्राउंड फ्लोर से पांच मंजिल तक कैसे पहुंची?

रिपोर्टों के अनुसार, इमारत का मूल ढांचा आज की पांच मंजिला संरचना जितना बड़ा नहीं था। बाद में इसमें अतिरिक्त निर्माण किए जाने और इसे छात्रों के लिए PG/हॉस्टल के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है।

यही वजह है कि जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इमारत की मूल संरचनात्मक क्षमता क्या थी और बाद में किए गए निर्माण से उस पर कितना अतिरिक्त भार पड़ा।

Financial Express की रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआती जानकारी में यह भी सामने आया है कि इमारत पर अनधिकृत निर्माण और बेसमेंट से जुड़े काम की जांच की जा रही है। MCD रिकॉर्ड और निर्माण अनुमति से जुड़े पहलुओं को भी जांच के दायरे में रखा गया है।

हादसे से पहले बेसमेंट में चल रहा था काम

सत्य निकेतन हादसे की सबसे अहम कड़ी बेसमेंट में चल रहा निर्माण और मरम्मत का काम माना जा रहा है।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, बेसमेंट में करीब 10 दिनों से मरम्मत का काम चल रहा था। पुलिस ने इस मामले में लेबर ठेकेदार को गिरफ्तार किया है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि संबंधित अधिकारियों को इस काम की जानकारी नहीं दी गई थी।

बेसमेंट में खुदाई या संरचनात्मक बदलाव करते समय जमीन और आसपास के पिलरों को पर्याप्त सपोर्ट देना बेहद जरूरी होता है। अगर ऐसा नहीं किया जाए, तो नींव के आसपास की मिट्टी खिसक सकती है और लोड ट्रांसफर का संतुलन बिगड़ सकता है।

बारिश के पानी ने बढ़ाया खतरा?

हादसे के समय दिल्ली में बारिश भी हुई थी। शुरुआती जांच में बेसमेंट में पानी जमा होने को भी संभावित कारणों में शामिल किया गया है।

AP के मुताबिक, अधिकारियों को आशंका है कि बेसमेंट में पानी जमा होने और वहां चल रहे निर्माण कार्य ने इमारत की संरचना को कमजोर करने में भूमिका निभाई हो सकती है।

बारिश के दौरान अगर किसी पुरानी इमारत की नींव के आसपास पानी जमा हो जाए, तो मिट्टी की मजबूती प्रभावित हो सकती है। इसके साथ यदि उसी जगह खुदाई या निर्माण कार्य भी चल रहा हो, तो खतरा और बढ़ जाता है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि अंतिम कारण जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। अभी तक पानी, बेसमेंट का काम, पुराना ढांचा और कथित अनधिकृत निर्माण सभी जांच के प्रमुख पहलू हैं।

एक पिलर कमजोर हुआ तो पूरा ढांचा कैसे गिर गया?

ऐसे हादसों में सबसे खतरनाक स्थिति तब बनती है जब किसी महत्वपूर्ण पिलर, बीम या नींव का हिस्सा अपनी क्षमता खो देता है।

पांच मंजिला इमारत में ऊपर की मंजिलों का पूरा भार नीचे के पिलर और नींव पर ट्रांसफर होता है। अगर किसी महत्वपूर्ण हिस्से की क्षमता अचानक कम हो जाए, तो उसका भार आसपास के दूसरे हिस्सों पर जाने लगता है। यदि वे हिस्से भी उस अतिरिक्त भार को संभाल नहीं पाते, तो क्रमिक संरचनात्मक विफलता हो सकती है।

इसी तरह की स्थिति में ऊपर की मंजिलें एक-दूसरे पर गिरती चली जाती हैं। इसे आमतौर पर पैनकेक कॉलैप्स (Pancake Collapse) कहा जाता है।

सत्य निकेतन हादसे की तस्वीरों और घटनाक्रम ने भी इसी तरह के अचानक ढहने की आशंका को जन्म दिया है, हालांकि इसकी तकनीकी पुष्टि स्ट्रक्चरल जांच के बाद ही होगी।

100 हाथियों जितना वजन कैसे?

पांच मंजिला RCC इमारत का वजन कई सौ टन हो सकता है। हालांकि, सत्य निकेतन की इस विशेष इमारत का सटीक कुल वजन अभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं हुआ है

यदि केवल एक मोटे इंजीनियरिंग अनुमान के तौर पर इमारत का वजन 400 से 500 टन माना जाए, तो यह बेहद भारी भार होता है। एक वयस्क हाथी का वजन आमतौर पर कई टन होता है। इसलिए 400-500 टन का भार मोटे तौर पर करीब 80 से 100 से अधिक हाथियों के संयुक्त वजन के बराबर बैठ सकता है।

इसलिए “100 हाथियों जितना वजन” एक समझाने वाला तुलनात्मक उदाहरण है, न कि जांच एजेंसियों द्वारा जारी किया गया इमारत के वास्तविक वजन का आंकड़ा।

इमारत पहले से थी खतरे में?

हादसे के बाद आसपास की इमारतों की सुरक्षा को लेकर भी प्रशासन सक्रिय हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक, सत्य निकेतन और आसपास के इलाकों में कई ऐसी इमारतों की पहचान की जा रही है जिनमें अवैध निर्माण या संरचनात्मक कमजोरी की आशंका है। MCD ने खतरनाक संरचनाओं पर कार्रवाई और कुछ इमारतों को खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की है।

Financial Express की रिपोर्ट के अनुसार, हादसे वाली इमारत को लेकर यह भी जांच की जा रही है कि वह किस तरह के निर्माण की अनुमति के तहत बनी थी और बाद में उसमें क्या-क्या बदलाव किए गए।

PG और हॉस्टल की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

सत्य निकेतन में बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के आसपास PG और हॉस्टल की मांग बहुत ज्यादा है। ऐसे में कई पुरानी इमारतों को छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

हादसे के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसी इमारतों का नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट होता है? क्या उनमें अवैध निर्माण की समय रहते पहचान की जाती है? और क्या बेसमेंट में बिना उचित अनुमति के निर्माण या खुदाई पर प्रभावी निगरानी होती है?

दिल्ली सरकार ने हादसे के बाद PG और सार्वजनिक उपयोग वाली इमारतों के लिए संरचनात्मक सुरक्षा और ऑडिट की दिशा में कदम उठाने की बात कही है।

मालिक और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई

हादसे के बाद पुलिस ने इमारत से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है। इमारत के मालिक को गिरफ्तार किया गया है और बेसमेंट में काम करने वाले लेबर ठेकेदार की भी गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है। MCD के पांच अधिकारियों को भी निलंबित किया गया है।

जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि क्या निर्माण कार्य नियमों के मुताबिक था, क्या इमारत की संरचनात्मक स्थिति की जानकारी अधिकारियों को थी और क्या सुरक्षा नियमों की अनदेखी हुई।

हादसे ने दिल्ली की पुरानी इमारतों का खतरा सामने ला दिया

सत्य निकेतन हादसा केवल एक इमारत के गिरने की घटना नहीं है। इसने दिल्ली जैसे महानगर में पुरानी इमारतों, अवैध अतिरिक्त निर्माण, बेसमेंट में होने वाले अनधिकृत काम और छात्र PG की सुरक्षा पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर किसी पुरानी इमारत में कई मंजिलें जोड़ दी जाएं, उसे दर्जनों लोगों के रहने के लिए इस्तेमाल किया जाए और उसी दौरान उसकी नींव या बेसमेंट में काम किया जाए, तो क्या उसकी संरचनात्मक क्षमता की जांच की गई थी?

सत्य निकेतन की घटना में अंतिम जिम्मेदारी जांच पूरी होने के बाद तय होगी। लेकिन हादसे ने यह साफ कर दिया है कि पुरानी इमारत + अतिरिक्त निर्माण + बेसमेंट में खुदाई + पानी का दबाव जैसी परिस्थितियों को नजरअंदाज करना कितना खतरनाक साबित हो सकता है।

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