A K Hangal Death Anniversary: ए.के. हंगल का फिल्मी सफर और यादगार किरदार
A K Hangal Death Anniversary: ए.के. हंगल का फिल्मी सफर
A K Hangal Death Anniversary के मौके पर हिंदी सिनेमा के दिग्गज चरित्र अभिनेता ए.के. हंगल को याद किया जा रहा है। अपनी सादगी, दमदार अभिनय और सहज अंदाज से उन्होंने फिल्मों में ऐसे किरदार निभाए, जो लंबे समय तक दर्शकों की यादों में बने रहे। खास तौर पर ‘शोले’ के रहीम चाचा के रूप में उनका अभिनय हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार किरदारों में गिना जाता है।
ए.के. हंगल का पूरा नाम अवतार किशन हंगल था। उनका जन्म 1 फरवरी 1914 को सियालकोट में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में थिएटर, सामाजिक गतिविधियों और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े काम किए। बाद में यही अनुभव उनके अभिनय की मजबूत नींव बने।
26 अगस्त 2012 को मुंबई में उनका निधन हुआ। आज उनकी पुण्यतिथि पर उनके संघर्ष, थिएटर के प्रति समर्पण और हिंदी सिनेमा में दिए गए योगदान को याद किया जा रहा है।
बचपन से ही अलग राह चुनने का जुनून
ए.के. हंगल का जीवन आम फिल्मी सितारों जैसा नहीं था। उन्होंने फिल्मों में बहुत देर से कदम रखा। अभिनय की दुनिया में आने से पहले उन्होंने दर्जी का काम किया और सामाजिक तथा मजदूर आंदोलनों से जुड़े रहे।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। बाद में थिएटर उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। यही वजह थी कि फिल्मों में आने से पहले ही उन्हें अभिनय और मंच का लंबा अनुभव हासिल हो चुका था।
उनकी जिंदगी का यह संघर्ष बाद में उनके अभिनय में भी दिखाई दिया। उनके किरदारों में बनावटीपन कम और वास्तविक जीवन की सहजता ज्यादा नजर आती थी।
1936 में थिएटर से शुरू हुआ अभिनय का सफर
ए.के. हंगल ने 1936 में पेशावर के एक थिएटर समूह से जुड़कर मंच पर अभिनय करना शुरू किया। वह कई साल तक थिएटर करते रहे और नाटकों के जरिए सामाजिक मुद्दों को भी लोगों तक पहुंचाते रहे।
भारत के विभाजन के बाद वह मुंबई पहुंचे और इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन यानी IPTA से जुड़े। यहां उनका संपर्क बलराज साहनी और कैफी आजमी जैसे कलाकारों और लेखकों से हुआ। IPTA से जुड़ने के बाद उनका थिएटर अनुभव और ज्यादा मजबूत हुआ।
थिएटर में लंबे समय तक काम करने के कारण उन्हें अभिनय की बारीकियों को समझने का अवसर मिला। यही अनुभव आगे चलकर उनके फिल्मी करियर में बहुत काम आया।
50 की उम्र के बाद फिल्मों में एंट्री
ए.के. हंगल ने हिंदी फिल्मों में बहुत देर से शुरुआत की। 1966 में आई ‘तीसरी कसम’ को उनके फिल्मी सफर की शुरुआती महत्वपूर्ण फिल्मों में माना जाता है। उस समय उनकी उम्र लगभग 50 से अधिक थी।
फिल्मों में उनकी शुरुआत भले ही देर से हुई, लेकिन इसके बाद उन्होंने लगातार काम किया। उन्होंने पिता, चाचा, बुजुर्ग, शिक्षक, मजदूर और आम आदमी जैसे कई तरह के किरदार निभाए।
उनके अभिनय की खासियत यह थी कि वह छोटे से छोटे किरदार में भी अपनी अलग छाप छोड़ देते थे। यही कारण रहा कि धीरे-धीरे वह हिंदी सिनेमा के सबसे भरोसेमंद चरित्र अभिनेताओं में शामिल हो गए।
‘शोले’ के रहीम चाचा ने दिलाई घर-घर पहचान
अगर ए.के. हंगल के सबसे यादगार किरदार की बात की जाए तो ‘शोले’ के रहीम चाचा का नाम सबसे पहले आता है। 1975 में रिलीज हुई इस फिल्म में उन्होंने एक बुजुर्ग और संवेदनशील किरदार निभाया था।
फिल्म का उनका चर्चित संवाद “इतना सन्नाटा क्यों है, भाई?” आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार संवादों में शामिल है। इस किरदार के जरिए हंगल ने बेहद कम समय में दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
‘शोले’ में उनका किरदार बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उनकी अभिनय क्षमता ने उसे बेहद प्रभावशाली बना दिया। यही ए.के. हंगल की खासियत थी—वह कहानी में छोटे किरदार को भी यादगार बना देते थे।
‘नमक हराम’ और दूसरे यादगार किरदार
ए.के. हंगल ने केवल ‘शोले’ में ही नहीं, बल्कि कई दूसरी फिल्मों में भी शानदार अभिनय किया। ‘नमक हराम’, ‘गुड्डी’, ‘बावर्ची’, ‘अभिमान’, ‘आंधी’, ‘परिचय’, ‘चिटचोर’, ‘कोरा कागज’, ‘शौकीन’ और ‘अवतार’ जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग किरदार देखने को मिले।
‘नमक हराम’ में उन्होंने मजदूरों से जुड़े किरदार को प्रभावशाली ढंग से निभाया। वहीं ‘बावर्ची’ और ‘गुड्डी’ जैसी फिल्मों में उनका सहज और पारिवारिक अंदाज दर्शकों को खूब पसंद आया।
उनका अभिनय किसी एक तरह के किरदार तक सीमित नहीं था। उन्होंने गंभीर, भावुक, सामाजिक और हास्य से जुड़े किरदार भी निभाए।
राजेश खन्ना के साथ भी किया काम
ए.के. हंगल ने सुपरस्टार राजेश खन्ना के साथ भी कई फिल्मों में काम किया। दोनों की जोड़ी कई फिल्मों में नजर आई और हंगल ने हर बार अपने सहायक किरदार को अपनी अलग पहचान दी। उपलब्ध जीवनी स्रोतों के अनुसार उन्होंने राजेश खन्ना के साथ करीब 16 फिल्मों में काम किया था।
यह उनके लंबे और विविध फिल्मी करियर की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
‘लगान’ में भी दिखाया दमदार अभिनय
ए.के. हंगल के करियर के अंतिम दौर में भी उनकी अभिनय क्षमता कम नहीं हुई। आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ में उन्होंने शंभू काका का किरदार निभाया। फिल्म में उनका किरदार छोटा था, लेकिन उनकी उपस्थिति ने कहानी को एक अलग भावनात्मक रंग दिया।
‘लगान’ जैसी बड़ी फिल्म में काम करना उनके लंबे करियर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उन्होंने उम्र के अंतिम पड़ाव तक अभिनय के प्रति अपना समर्पण बनाए रखा।
200 से अधिक फिल्मों में किया अभिनय
ए.के. हंगल ने अपने लंबे फिल्मी करियर में 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। अलग-अलग स्रोत उनकी फिल्मों की संख्या अलग बताते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि उन्होंने हिंदी सिनेमा में कई दशकों तक सक्रिय रहकर बड़ी संख्या में फिल्मों में अभिनय किया।
उनकी फिल्मोग्राफी में अलग-अलग दौर की फिल्में शामिल हैं। उन्होंने 1960 और 1970 के दशक से लेकर बाद के वर्षों तक लगातार काम किया।
उनकी लोकप्रियता सिर्फ बड़े पर्दे तक सीमित नहीं रही। उन्होंने टेलीविजन पर भी काम किया और जीवन के अंतिम वर्षों में भी कैमरे के सामने नजर आए।
पद्म भूषण से हुए सम्मानित
भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2006 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। यह उनके लंबे फिल्मी और सांस्कृतिक योगदान की बड़ी पहचान थी।
यह सम्मान उस कलाकार को मिला, जिसने ग्लैमर से दूर रहकर अपने अभिनय और किरदारों के जरिए दर्शकों के दिल में जगह बनाई।
आखिरी दौर में आर्थिक परेशानियां भी झेलीं
जीवन के अंतिम वर्षों में ए.के. हंगल को आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा। उनकी खराब तबीयत और इलाज के खर्च को लेकर भी खबरें सामने आई थीं। फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों और संस्थाओं ने उस समय उनकी आर्थिक मदद की।
इसके बावजूद उनका अभिनय के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ। वह अंतिम दौर तक काम करने की इच्छा रखते रहे और टेलीविजन पर भी नजर आए।
26 अगस्त 2012 को हुआ निधन
ए.के. हंगल का निधन 26 अगस्त 2012 को मुंबई में हुआ। वह 95 वर्ष के थे, हालांकि उनकी जन्मतिथि के अलग-अलग स्रोतों के कारण उम्र को लेकर भी पुराने रिकॉर्ड में अंतर मिलता है।
उनके निधन के बाद हिंदी सिनेमा ने एक ऐसे चरित्र अभिनेता को खो दिया, जिसने बिना किसी स्टारडम के अपनी अभिनय क्षमता से दर्शकों के दिल में स्थायी जगह बनाई।
आज भी याद किए जाते हैं ए.के. हंगल
ए.के. हंगल को याद करने के लिए सिर्फ ‘शोले’ का रहीम चाचा ही काफी नहीं है। उन्होंने हिंदी सिनेमा में आम आदमी, बुजुर्ग, पिता, चाचा, मजदूर और संवेदनशील इंसान जैसे किरदारों को एक अलग गरिमा दी।
उनके अभिनय में सादगी थी और यही सादगी उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। वह अपने किरदारों को जरूरत से ज्यादा दिखाने की कोशिश नहीं करते थे, बल्कि सहज अभिनय के जरिए दर्शकों से जुड़ जाते थे।
उनकी विरासत आज भी उन कलाकारों के लिए प्रेरणा है, जो मानते हैं कि अभिनय में उम्र से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रतिभा, अनुभव और समर्पण होता है।
निष्कर्ष
A K Hangal Death Anniversary पर उन्हें याद करना भारतीय सिनेमा के उस दौर को याद करना भी है, जब चरित्र अभिनेता कहानी की आत्मा हुआ करते थे। ए.के. हंगल ने थिएटर से शुरुआत की, सामाजिक आंदोलनों से जुड़े, स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया और फिर जिंदगी के काफी बाद के दौर में फिल्मों में कदम रखा।
उन्होंने ‘शोले’, ‘नमक हराम’, ‘बावर्ची’, ‘गुड्डी’, ‘अभिमान’, ‘आंधी’, ‘अवतार’, ‘शौकीन’ और ‘लगान’ जैसी फिल्मों में अपने अभिनय की छाप छोड़ी।
उनका सफर यह साबित करता है कि सपनों को पूरा करने की कोई उम्र नहीं होती। 50 की उम्र के बाद हिंदी सिनेमा में कदम रखने वाले ए.के. हंगल ने आने वाली पीढ़ियों के लिए यह मिसाल कायम की कि मेहनत, अनुभव और प्रतिभा के दम पर किसी भी उम्र में अपनी पहचान बनाई जा सकती है।

