NDA के 360 मिशन में DMK की एंट्री? तमिलनाडु से उठीं नई राजनीतिक अटकलें
नई दिल्ली: देश की राजनीति में एक बार फिर गठबंधन की राजनीति चर्चा के केंद्र में आ गई है। लोकसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की बढ़ती ताकत और विपक्षी दलों में जारी उठापटक के बीच तमिलनाडु की प्रमुख पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) को लेकर नई राजनीतिक अटकलें शुरू हो गई हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि क्या डीएमके भविष्य में एनडीए का समर्थन कर सकती है और क्या इससे केंद्र की राजनीति का गणित बदल सकता है।
हाल के दिनों में तमिलनाडु की राजनीति में हुए कुछ घटनाक्रमों ने इन चर्चाओं को और तेज कर दिया है। डीएमके की सहयोगी रही इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने आधिकारिक तौर पर डीएमके नेतृत्व वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (SPA) से अलग होने का फैसला किया है। इस फैसले को राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सहयोगी दलों के अलग होने से डीएमके के सामने नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
इसी बीच कांग्रेस समेत कुछ अन्य दलों द्वारा तमिलनाडु में नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर लिए गए फैसलों ने भी चर्चाओं को जन्म दिया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बदलते हालात में तमिलनाडु की राजनीति नए मोड़ पर पहुंच सकती है। हालांकि डीएमके की ओर से अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया है कि वह एनडीए के साथ जाने की तैयारी कर रही है।
लोकसभा चुनाव के बाद एनडीए के पास 293 सांसदों का समर्थन था। इसके बाद विभिन्न राज्यों में हुए राजनीतिक बदलावों और विपक्षी दलों के कुछ सांसदों के अलग रुख अपनाने के कारण गठबंधन की संख्या में बढ़ोतरी की चर्चा है। खासकर पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की राजनीति में हुए घटनाक्रमों के बाद एनडीए की स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत मानी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषणों के अनुसार वर्तमान समय में एनडीए का आंकड़ा करीब 319 सीटों तक पहुंच चुका है। ऐसे में डीएमके के 22 सांसदों की भूमिका को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। यदि भविष्य में डीएमके किसी रूप में एनडीए का समर्थन करती है तो गठबंधन का आंकड़ा लगभग 341 तक पहुंच सकता है। यह संख्या लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए जरूरी 360 सीटों के काफी करीब होगी।
दो-तिहाई बहुमत किसी भी सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। संविधान संशोधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों और बड़े विधायी बदलावों को पारित कराने में यह संख्या अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक एनडीए के संख्या बल में संभावित बढ़ोतरी को महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
महिला आरक्षण कानून के पूर्ण क्रियान्वयन, परिसीमन (Delimitation) और कई अन्य बड़े विधायी सुधारों को लेकर भी दो-तिहाई बहुमत को निर्णायक माना जाता है। यदि सरकार इस संख्या के करीब पहुंचती है तो संसद में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाने में उसे अधिक राजनीतिक ताकत मिल सकती है।
हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ इन अटकलों को लेकर सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि डीएमके और भाजपा की राजनीतिक विचारधाराएं लंबे समय से अलग रही हैं। तमिलनाडु में डीएमके खुद को भाजपा के प्रमुख विरोधी दल के रूप में स्थापित करती रही है और दोनों दलों के बीच कई मुद्दों पर वैचारिक मतभेद भी रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भारतीय राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं और गठबंधन की राजनीति में कोई भी संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती। इसके बावजूद वर्तमान स्थिति में डीएमके के एनडीए में शामिल होने को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी या संकेत उपलब्ध नहीं है।
फिलहाल इतना जरूर है कि लोकसभा में बढ़ती एनडीए की ताकत और तमिलनाडु की राजनीति में बदलते समीकरणों ने इस चर्चा को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया है। आने वाले समय में राजनीतिक घटनाक्रम यह तय करेंगे कि यह केवल अटकलें साबित होती हैं या फिर देश की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। तब तक डीएमके के एनडीए में शामिल होने की चर्चाओं को केवल राजनीतिक संभावनाओं के रूप में ही देखा जा रहा है।

