जंग से भारत को हर साल 14 लाख करोड़ रुपये का नुकसान, नोमुरा रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

नई दिल्ली। सीमा पर शांति होने के बावजूद भारत हर साल एक ऐसी “जंग” से जूझ रहा है, जो देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा रही है। यहां बात युद्ध की नहीं, बल्कि लोहे और अन्य धातुओं में लगने वाली जंग (Corrosion) की हो रही है। वैश्विक वित्तीय संस्था नोमुरा की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जंग की वजह से भारत को हर साल लगभग 14 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

रिपोर्ट के अनुसार, यदि जंग से बचाव के प्रभावी उपाय अपनाए जाएं तो देश की जीडीपी में लगभग 1.5 प्रतिशत तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी संभव है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल रखरखाव का मामला नहीं, बल्कि सीधे तौर पर आर्थिक विकास, सार्वजनिक सुरक्षा और राष्ट्रीय उत्पादकता से जुड़ा मुद्दा है।

किन क्षेत्रों पर सबसे अधिक असर

नोमुरा की रिपोर्ट के मुताबिक, जंग का सबसे अधिक असर देश के बिजली उत्पादन और ट्रांसमिशन नेटवर्क पर पड़ता है। इसके अलावा रेलवे ट्रैक, पुल, इमारतें, औद्योगिक संयंत्र, पाइपलाइन और अन्य आधारभूत संरचनाएं भी इससे गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं।

समय से पहले धातु संरचनाओं के खराब होने के कारण उनकी मरम्मत, प्रतिस्थापन और रखरखाव पर सरकार और निजी कंपनियों को भारी खर्च करना पड़ता है। इससे न केवल परियोजनाओं की लागत बढ़ती है, बल्कि कई बार सेवाओं में बाधा भी आती है।

GDP का 4.3 प्रतिशत तक नुकसान

रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत में जंग से होने वाला कुल आर्थिक नुकसान देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 4.3 प्रतिशत है। यह आंकड़ा इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।

यदि GDP के अनुपात में इस नुकसान को देखा जाए तो यह कई बड़े सरकारी मंत्रालयों के वार्षिक बजट के बराबर बैठता है। इसका मतलब है कि केवल जंग की वजह से देश हर साल उतने संसाधन खो देता है, जिनका उपयोग सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और ऊर्जा परियोजनाओं में किया जा सकता था।

बिजली क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित

नोमुरा के अनुसार, बिजली क्षेत्र को जंग से सबसे अधिक नुकसान होता है। बिजली संयंत्रों में इस्तेमाल होने वाले बॉयलर, पाइप, टरबाइन और ट्रांसमिशन टावर लगातार नमी, गर्मी और प्रदूषण के संपर्क में रहते हैं, जिससे उनमें तेजी से जंग लगती है।

इसके बाद टेलीकॉम, ऑटोमोबाइल, रेलवे और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं। रेलवे पुलों और पटरियों में जंग बढ़ने से सुरक्षा जोखिम भी बढ़ जाते हैं, जबकि टेलीकॉम टावरों की मजबूती पर भी इसका असर पड़ता है।

जापान और अमेरिका से सीख

रिपोर्ट में जापान और अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि वहां मौसम, आर्द्रता, समुद्री वातावरण और औद्योगिक प्रदूषण को ध्यान में रखकर अलग-अलग सुरक्षा मानक अपनाए जाते हैं।

उदाहरण के लिए, समुद्र तटीय क्षेत्रों में विशेष एंटी-कोरोजन कोटिंग, उच्च गुणवत्ता वाले स्टील और नियमित निरीक्षण की व्यवस्था होती है। इसके विपरीत भारत में कई बार अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद एक जैसे निर्माण और रखरखाव मानक लागू किए जाते हैं।

मानसून में बढ़ती है समस्या

भारत में मानसून के दौरान हवा में नमी काफी बढ़ जाती है। यही नमी धातुओं में ऑक्सीकरण की प्रक्रिया को तेज करती है। विशेष रूप से तटीय राज्यों, भारी उद्योग वाले क्षेत्रों और अधिक वर्षा वाले इलाकों में जंग की समस्या और गंभीर हो जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय पर पेंटिंग, गैल्वनाइजेशन, सुरक्षात्मक कोटिंग और निरीक्षण नहीं किया जाए, तो संरचनाओं की आयु कई वर्षों तक कम हो सकती है।

समाधान क्या हो सकते हैं

रिपोर्ट और उद्योग विशेषज्ञों ने कुछ प्रमुख उपाय सुझाए हैं:

  • वैश्विक मानकों के अनुरूप निर्माण सामग्री का उपयोग
  • बेहतर एंटी-कोरोजन कोटिंग तकनीक
  • नियमित निरीक्षण और रखरखाव प्रणाली
  • मौसम और क्षेत्र के अनुसार स्थानीय सुरक्षा मानक
  • सरकारी परियोजनाओं में लाइफ-साइकिल कॉस्ट को प्राथमिकता देना

इन उपायों को अपनाने से न केवल राष्ट्रीय संपत्तियों की उम्र बढ़ेगी, बल्कि लंबे समय में सरकारी खर्च में बड़ी कमी भी आएगी।

अर्थव्यवस्था को हो सकता है बड़ा फायदा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत जंग से होने वाले नुकसान को प्रभावी ढंग से कम करने में सफल होता है, तो इससे इंफ्रास्ट्रक्चर की विश्वसनीयता बढ़ेगी, ऊर्जा हानि कम होगी और उद्योगों की उत्पादकता में सुधार होगा

नोमुरा का आकलन है कि प्रभावी रोकथाम से देश की अर्थव्यवस्था को इतना लाभ हो सकता है कि GDP में लगभग 1.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त वृद्धि संभव हो जाए। यह वृद्धि भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

निष्कर्ष

जंग को अक्सर केवल तकनीकी या रखरखाव की समस्या माना जाता है, लेकिन नोमुरा की रिपोर्ट बताती है कि यह वास्तव में राष्ट्रीय आर्थिक चुनौती बन चुकी है। हर साल 14 लाख करोड़ रुपये का संभावित नुकसान इस बात का संकेत है कि भारत को अब कोरोजन प्रबंधन को नीति स्तर पर प्राथमिकता देनी होगी। बेहतर तकनीक, क्षेत्र-विशिष्ट मानक और नियमित रखरखाव अपनाकर देश न केवल अपनी राष्ट्रीय संपत्तियों की सुरक्षा कर सकता है, बल्कि आर्थिक विकास को भी नई गति दे सकता है।

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