JPSC घोटाले में CBI का बड़ा खुलासा, जांच में रिकॉर्ड छिपाने और नियमों की अनदेखी के गंभीर आरोप
JPSC Scam: झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) से जुड़े बहुचर्चित भर्ती घोटाले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की चार्जशीट ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि आयोग में केवल भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताएं ही नहीं हुईं, बल्कि जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण जानकारियां भी छिपाई गईं। CBI ने करीब 12 वर्षों तक जांच करने के बाद दो वर्ष पहले अपनी चार्जशीट विशेष CBI अदालत में दाखिल की थी। हालांकि, अब तक इस मामले में ट्रायल शुरू नहीं हो सका है।
JPSC Scam एक बार फिर चर्चा में है, क्योंकि हाल ही में CID द्वारा की गई कार्रवाई में उप परीक्षा नियंत्रक, परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी के निदेशक की गिरफ्तारी और तत्कालीन अध्यक्ष के ठिकानों पर छापेमारी के बाद पुराने मामलों की परतें फिर खुलने लगी हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि आयोग में कथित अनियमितताओं का सिलसिला दो दशक पहले शुरू हुआ और समय-समय पर अलग-अलग जांच एजेंसियों ने इसमें कई गंभीर तथ्य उजागर किए।
CBI की चार्जशीट के अनुसार, आयोग ने जांच के दौरान कई अहम रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए। एजेंसी ने आरोप लगाया कि इंटरव्यू बोर्ड का गठन किस आधार पर किया गया, बोर्ड में सदस्यों का चयन कैसे हुआ और किन मानकों का पालन किया गया, इसकी जानकारी आयोग ने गोपनीयता का हवाला देकर साझा नहीं की। इतना ही नहीं, आयोग ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि उसके पदाधिकारियों के रिश्तेदार भर्ती परीक्षा में शामिल हुए थे या नहीं, जबकि आवेदन पत्र में इससे संबंधित अलग कॉलम मौजूद था।
जांच रिपोर्ट में OMR स्कैनिंग प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। CBI के अनुसार, जिस OMR स्कैनिंग मशीन का उपयोग किया गया था, उसमें स्वयं की मेमोरी नहीं थी और उसे बाहरी कंप्यूटर से जोड़कर प्रोग्राम किया जा सकता था। आरोप है कि स्कैनिंग की पूरी प्रक्रिया आयोग के स्ट्रॉन्ग रूम में सीमित लोगों की मौजूदगी में हुई और इसमें एक निजी कंप्यूटर का इस्तेमाल किया गया। जांच एजेंसी का कहना है कि बाद में संबंधित व्यक्ति अपना कंप्यूटर अपने साथ ले गया और वह कभी बरामद नहीं हो सका, जिससे जांच प्रभावित हुई।
चार्जशीट में परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों के चयन पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पहली संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा की प्रोसेसिंग एक एजेंसी को दी गई थी, जबकि दूसरी परीक्षा के लिए दूसरी एजेंसी का चयन किया गया। लेकिन चयन प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं मिले। जांच के दौरान एक पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसे CBI ने बैकडेटेड यानी पीछे की तारीख में तैयार किया गया दस्तावेज बताया।
मुख्य परीक्षा की उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन को लेकर भी रिपोर्ट में गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। जांच के अनुसार, उत्तरपुस्तिकाएं वाराणसी भेजी गईं और मई से जुलाई 2007 के बीच मूल्यांकन कराया गया। यह अवधि अधिकांश विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की ग्रीष्मकालीन छुट्टियों की थी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि संबंधित विश्वविद्यालय की औपचारिक अनुमति के बिना मूल्यांकन कराया गया, जिससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठे।
CBI ने इंटरव्यू प्रक्रिया में भी नियमों के उल्लंघन का उल्लेख किया है। रिपोर्ट के अनुसार, JPSC विनियम 2002 के प्रावधानों का पालन किए बिना इंटरव्यू बोर्ड गठित किया गया। जांच में यह भी पाया गया कि कुछ अभ्यर्थियों को अलग-अलग इंटरव्यू सदस्यों द्वारा दिए गए अंकों में अत्यधिक अंतर था। एजेंसी का कहना है कि सामान्य मूल्यांकन प्रक्रिया में इतने बड़े अंतर असामान्य माने जाते हैं।
चार्जशीट में कुछ नियुक्तियों पर भी सवाल उठाए गए हैं। जांच एजेंसी ने कहा कि उस समय प्रभावशाली राजनीतिक और प्रशासनिक व्यक्तियों से जुड़े कुछ अभ्यर्थियों की नियुक्तियां संदेह के घेरे में थीं। हालांकि अंतिम दोषसिद्धि का निर्णय अदालत में मुकदमे की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।
रिपोर्ट में वर्ष 2006 से 2008 के बीच डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी, सेल्स टैक्स ऑफिसर सहित विभिन्न पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया की जांच का उल्लेख है। CBI ने आरोप लगाया कि रिकॉर्ड में कथित हेराफेरी और निर्धारित प्रक्रिया से हटकर चयन किए जाने के संकेत मिले। इसी आधार पर कई आरोपियों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र और अन्य धाराओं में मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई।
फिलहाल इस मामले में CID की नई जांच और CBI की पहले से दाखिल चार्जशीट के चलते JPSC की भर्ती प्रक्रियाएं एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम फैसला न्यायालय में लंबित सुनवाई के बाद ही होगा। जब तक अदालत अपना निर्णय नहीं देती, सभी आरोप न्यायिक परीक्षण के अधीन माने जाएंगे।

