PM Modi Naxalism Statement: ‘दिमागी नक्सलियों’ से भी देश को बचाना होगा

PM Modi Naxalism Statement: ‘दिमागी नक्सलियों’ से भी देश को बचाना होगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से देश को संबोधित करते हुए नक्सलवाद और माओवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का जिक्र किया। करीब 76 मिनट के संबोधन में पीएम मोदी ने कहा कि नक्सलवाद ने लंबे समय तक देश के बड़े हिस्से को प्रभावित किया और बड़ी संख्या में युवाओं के भविष्य को नुकसान पहुंचाया। उन्होंने कहा कि जिन इलाकों में कभी हिंसा और भय का माहौल दिखाई देता था, वहां अब विकास, विश्वास और तिरंगा नजर आ रहा है।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि वर्ष 2014 में केंद्र में सरकार बनने के बाद नक्सलवाद को खत्म करने का संकल्प लिया गया था। इसके लिए सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों पर भी जोर दिया गया। सरकार का दावा है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई और विकास की योजनाओं के कारण नक्सली हिंसा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में लगातार बदलाव आया है।

नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई का किया जिक्र

पीएम मोदी ने कहा कि नक्सली हिंसा के कारण देश को लंबे समय तक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इस दौरान बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी और सुरक्षा बलों के जवानों ने अपनी जान गंवाई। इसके अलावा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले आम नागरिकों और युवाओं को भी हिंसा का सामना करना पड़ा।

प्रधानमंत्री के अनुसार, सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के साथ-साथ सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया। उनका कहना था कि केवल सुरक्षा अभियान के जरिए नक्सलवाद की समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया जा सकता। इसके लिए प्रभावित इलाकों के लोगों का विश्वास जीतना और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ना भी जरूरी है।

‘हथियारबंद नक्सलवाद’ के बाद विचारधारा पर जोर

अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने नक्सलवाद के बदलते स्वरूप को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हथियारबंद नक्सलवाद का प्रभाव काफी हद तक कम हुआ है, लेकिन अब देश को उन लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है जिन्हें उन्होंने ‘दिमागी नक्सली’ कहा।

पीएम मोदी ने आरोप लगाया कि ऐसी विचारधारा से प्रभावित लोग युवाओं को भटकाने और समाज में हिंसा तथा अशांति का वातावरण तैयार करने की कोशिश कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं को ऐसी गतिविधियों से बचाकर विकास और राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ाना जरूरी है।

हालांकि ‘दिमागी नक्सली’ शब्द को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आ सकती हैं। इस बयान ने नक्सलवाद की समस्या को केवल सुरक्षा के नजरिए से नहीं, बल्कि विचारधारा और युवा पीढ़ी के भविष्य से जोड़कर देखने की बहस को भी सामने ला दिया है।

युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में युवाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना था कि देश के युवाओं को हिंसा और भटकाव की जगह शिक्षा, रोजगार, तकनीक और राष्ट्र निर्माण के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि देश का विकास तभी संभव है जब हर क्षेत्र और हर वर्ग के युवा अपनी क्षमता का इस्तेमाल कर सकें। नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास कार्यों को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा बताया गया।

सरकार की ओर से पिछले वर्षों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़क और संचार सुविधाओं के विस्तार, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने तथा सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

31 मार्च 2026 की समय-सीमा का भी संदर्भ

केंद्र सरकार ने देश से नक्सलवाद को खत्म करने के लिए 31 मार्च 2026 की समय-सीमा का लक्ष्य रखा था। स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद के खिलाफ मिली सफलता को सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल किया।

सरकार का तर्क रहा है कि सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई के कारण कई इलाकों में नक्सली संगठनों की गतिविधियां कमजोर हुई हैं। इसके साथ ही कई नक्सलियों के आत्मसमर्पण और पुनर्वास की प्रक्रिया को भी सरकार अपनी रणनीति का हिस्सा मानती रही है।

विकास को बताया नक्सलवाद के खिलाफ अहम हथियार

प्रधानमंत्री मोदी ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई को केवल बंदूक और सुरक्षा अभियान तक सीमित नहीं बताया। उन्होंने विकास को भी इस समस्या के समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।

उनके अनुसार, जिन क्षेत्रों में लंबे समय तक सरकारी व्यवस्था की पहुंच सीमित रही, वहां सड़क, स्कूल, अस्पताल, इंटरनेट और रोजगार जैसी सुविधाएं पहुंचने से लोगों का भरोसा मजबूत होता है। इससे युवाओं को हिंसक गतिविधियों से दूर रखने में मदद मिल सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय आबादी की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान करना लंबे समय के लिए महत्वपूर्ण है।

‘दिमागी नक्सलियों’ वाले बयान पर बढ़ सकती है बहस

प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद अब ‘दिमागी नक्सली’ शब्द राजनीतिक बहस का मुद्दा बन सकता है। जहां सरकार इसे हिंसक विचारधारा के खिलाफ चेतावनी के रूप में देखती है, वहीं विपक्ष या आलोचक यह सवाल उठा सकते हैं कि विचारधारा की पहचान किस आधार पर की जाएगी।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति, विरोध और आलोचना की भूमिका को लेकर भी इस बयान के संदर्भ में चर्चा हो सकती है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन प्रधानमंत्री के इस बयान पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं।

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