विश्व बैंक ने खत्म किया 45% क्लाइमेट फाइनेंस लक्ष्य, भारत पर क्या पड़ेगा असर?
विश्व बैंक क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है। विश्व बैंक (World Bank) ने विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु अपनी वार्षिक ऋण राशि का 45 प्रतिशत हिस्सा जलवायु परियोजनाओं के लिए सुरक्षित रखने के लक्ष्य को वापस ले लिया है। इस फैसले को वैश्विक जलवायु वित्त व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर खासकर उन विकासशील देशों पर पड़ सकता है, जो जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) से जुड़ी परियोजनाओं के लिए रियायती अंतरराष्ट्रीय वित्त पर निर्भर हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब दुनिया जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों से जूझ रही है। विश्व बैंक ने पहले संयुक्त राष्ट्र के COP-28 सम्मेलन के दौरान घोषणा की थी कि वह अपनी कुल वार्षिक लेंडिंग का 45 प्रतिशत हिस्सा जलवायु परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों के लिए आवंटित करेगा। अब इस लक्ष्य को वापस लेने से वैश्विक जलवायु वित्तपोषण की दिशा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
जानकारी के अनुसार, विश्व बैंक के इस निर्णय का फ्रांस समेत कई यूरोपीय देशों ने विरोध किया था। हालांकि, बैंक ने अंततः लक्ष्य को हटाने का फैसला किया। दूसरी ओर, राहत की बात यह रही कि क्लाइमेट चेंज एक्शन प्लान (CCAP) को समाप्त करने के बजाय आगे बढ़ा दिया गया है। यह फैसला विकासशील देशों के समूह की मांग के बाद लिया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव का प्रभाव केवल विश्व बैंक तक सीमित नहीं रहेगा। COP-29 और COP-30 के दौरान बहुपक्षीय विकास बैंकों (MDBs) के माध्यम से बड़े पैमाने पर जलवायु वित्त जुटाने की जो रणनीति बनाई जा रही थी, उस पर भी इसका असर पड़ सकता है। वर्ष 2024 में बहुपक्षीय विकास बैंकों ने संयुक्त रूप से लगभग 137 बिलियन डॉलर का क्लाइमेट फाइनेंस उपलब्ध कराया था, जिसमें विश्व बैंक की सबसे बड़ी हिस्सेदारी रही।
भारत पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की स्थिति अन्य कई विकासशील देशों से अलग है। भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसके पास पूंजी जुटाने के कई वैकल्पिक स्रोत मौजूद हैं। इसलिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य व्यावसायिक ग्रीन एनर्जी परियोजनाओं के लिए निजी निवेश मिलने की संभावना बनी रहेगी।
हालांकि, चिंता उन परियोजनाओं को लेकर है जो सीधे मुनाफा नहीं कमातीं, लेकिन समाज और पर्यावरण के लिए बेहद जरूरी हैं। इनमें बाढ़ नियंत्रण, सूखा प्रबंधन, शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी से बचाव, जल संरक्षण, जलवायु अनुकूल कृषि और तटीय सुरक्षा जैसी योजनाएं शामिल हैं। ऐसी परियोजनाएं अक्सर विश्व बैंक और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं से मिलने वाले रियायती एवं दीर्घकालिक ऋण पर निर्भर रहती हैं।
क्लाइमेट एंड सस्टेनेबिलिटी क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलवायु वित्त की उपलब्धता कम होती है तो भारत समेत कई विकासशील देशों में जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है। इससे भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम से निपटने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।
कुछ नीति विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यह फैसला वैश्विक बहुपक्षीय सहयोग की कमजोरी को दर्शाता है। उनके अनुसार, अब एशिया जैसे क्षेत्रों को अपनी अलग ग्रीन फाइनेंस संस्थाओं या क्षेत्रीय जलवायु फंड की दिशा में गंभीरता से काम करना चाहिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर निर्भरता कम हो सके।
वहीं, कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और आर्थिक प्राथमिकताओं में बदलाव के कारण जलवायु वित्त पर दबाव बढ़ा है। उनका कहना है कि यदि जलवायु परियोजनाओं के लिए समर्पित फंड कम होते हैं, तो सबसे पहले उन योजनाओं पर असर पड़ेगा जिनके परिणाम लंबे समय बाद दिखाई देते हैं।
अंतरराष्ट्रीय जलवायु विशेषज्ञों ने भी इस निर्णय पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं के लिए अभी भी बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता की आवश्यकता है। यदि ऐसे समय में वित्तीय लक्ष्य कमजोर किए जाते हैं, तो जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित देशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
हालांकि, विश्व बैंक का कहना है कि उसका जलवायु परिवर्तन से जुड़ा कार्य पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और क्लाइमेट चेंज एक्शन प्लान (CCAP) जारी रहेगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बैंक नई रणनीति के तहत विकासशील देशों को किस प्रकार का वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराता है और जलवायु परियोजनाओं के लिए फंडिंग का वास्तविक स्तर कितना बना रहता है।

