अल नीनो का बढ़ता खतरा! नवंबर तक दिख सकता है असर, कमजोर मानसून से बढ़ी चिंता
अल नीनो का बढ़ता खतरा! नवंबर तक दिख सकता है असर, कमजोर मानसून से बढ़ी चिंता
देश में इस वर्ष भीषण गर्मी और सामान्य से कमजोर मानसून के संकेतों के बीच अल नीनो को लेकर चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। विश्व मौसम संगठन (WMO) के ताजा आकलन ने मौसम वैज्ञानिकों के साथ-साथ किसानों और सरकार की चिंता भी बढ़ा दी है। संगठन के अनुसार जून से अगस्त के बीच अल नीनो बनने की लगभग 80 प्रतिशत संभावना है, जबकि इसके नवंबर तक बने रहने की आशंका 90 प्रतिशत से अधिक बताई गई है। यदि ऐसा होता है तो भारत सहित दुनिया के कई देशों में तापमान, वर्षा और मौसम के पैटर्न पर व्यापक असर देखने को मिल सकता है।
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ने की स्थिति को कहा जाता है। इसका प्रभाव केवल समुद्री क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम चक्र को प्रभावित करता है। भारत में अक्सर अल नीनो के दौरान मानसून कमजोर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे बारिश कम होती है और सूखे जैसी परिस्थितियां बन सकती हैं।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी अल नीनो की संभावित स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा है कि केंद्र सरकार ने पहले से तैयारी शुरू कर दी है। उन्होंने जानकारी दी कि देश के 12 राज्यों के 300 से अधिक जिलों को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इनमें 111 ऐसे जिले हैं जहां सिंचाई की सुविधाएं बेहद सीमित हैं। इन क्षेत्रों में यदि मानसून सामान्य से कम रहता है तो खेती-किसानी पर बड़ा असर पड़ सकता है।
सरकार ने सभी संबंधित राज्यों को निर्देश दिए हैं कि वे जल संरक्षण के कार्यों में तेजी लाएं। तालाबों, जलाशयों और चेक डैम की मरम्मत समय पर पूरी की जाए ताकि उपलब्ध जल का अधिकतम उपयोग किया जा सके। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य, रोजगार उपलब्ध कराने और किसानों को सहायता देने की योजना भी तैयार की जा रही है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार 1 जून से 27 जून के बीच देश में सामान्य से लगभग 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। यह आंकड़ा मानसून की कमजोर शुरुआत की ओर संकेत करता है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले सप्ताहों में बारिश की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है।
भारत की कृषि काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी खरीफ फसलें समय पर होने वाली बारिश पर आधारित होती हैं। यदि बारिश कम होती है तो उत्पादन में गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों की आय प्रभावित होने के साथ-साथ खाद्यान्न की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
कमजोर मानसून का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है तो कई राज्यों में पेयजल संकट भी गहरा सकता है। ग्रामीण इलाकों में जल स्रोत सूखने का खतरा बढ़ सकता है, जबकि पशुओं के लिए चारे और पानी की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे हालात में सरकार को अतिरिक्त राहत योजनाएं लागू करनी पड़ सकती हैं।
मौसम वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि अल नीनो का असर हर बार एक जैसा नहीं होता। कई बार मानसून पर इसका सीमित प्रभाव पड़ता है, जबकि कुछ वर्षों में इसका असर काफी व्यापक होता है। इसलिए आने वाले महीनों में मौसम विभाग लगातार स्थिति पर नजर रखेगा और समय-समय पर नए पूर्वानुमान जारी करेगा।
सरकार ने किसानों से भी अपील की है कि वे कृषि विभाग और मौसम विभाग द्वारा जारी सलाह का पालन करें। कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता देने, जल संरक्षण तकनीकों का उपयोग करने और मौसम आधारित खेती अपनाने की सलाह दी जा रही है। इससे संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
फिलहाल देशभर में मौसम और मानसून की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। यदि अल नीनो का प्रभाव अनुमान के अनुसार बढ़ता है तो इसका असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कृषि, जल संसाधन, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिल सकता है। ऐसे में सरकार और संबंधित एजेंसियों की तैयारियां आने वाले महीनों में बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगी।

