Russia India Rail Corridor: हिंद महासागर तक रेल संपर्क की नई रणनीति
Russia India Rail Corridor: हिंद महासागर तक रेल संपर्क की नई रणनीति
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस को आर्थिक प्रतिबंधों, ऊर्जा निर्यात पर दबाव और वैश्विक व्यापारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अब पश्चिम एशिया में बढ़ते अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य संकट ने रूस की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। ऐसे हालात में मॉस्को अब ऐसे वैकल्पिक परिवहन मार्गों की तलाश में है, जिनके जरिए वह रणनीतिक समुद्री रास्तों पर अपनी निर्भरता कम कर सके।
इसी संदर्भ में रूस-भारत रेल कॉरिडोर और हिंद महासागर तक रेल संपर्क का विचार फिर से चर्चा में आया है।
भारत तक पहुंच रूस के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
रूस के लिए तेल और गैस निर्यात सबसे अहम आर्थिक स्तंभों में से एक हैं। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा खरीदार रूस के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।
चीन के साथ रूस की सीधी स्थलीय सीमा होने के कारण वहां तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन भारत तक रूसी तेल और अन्य सामान पहुंचाने में समुद्री मार्गों की भूमिका बहुत बड़ी है।
होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने इस समुद्री मार्ग की अनिश्चितता को उजागर कर दिया है। यही वजह है कि रूस अब जमीन आधारित परिवहन विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
रूस ने क्या सुझाव दिया?
रूस के उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने कहा है कि भारत तक पहुंच प्रदान करने वाले नए रेल मार्ग की संभावनाओं का गंभीर अध्ययन किया जाना चाहिए।
उनके अनुसार:
- होर्मुज और बॉस्फोरस जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम करनी होगी।
- हिंद महासागर तक रेल संपर्क विकसित करना रणनीतिक रूप से जरूरी हो सकता है।
- तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होकर गुजरने वाले वैकल्पिक मार्गों पर विचार किया जा सकता है।
- भारत तक पहुंच प्रदान करने वाला कोई भी व्यवहारिक विकल्प रूस के लिए महत्वपूर्ण होगा।
खुसनुलिन का यह बयान रूसी सरकारी समाचार एजेंसी तास को दिए गए इंटरव्यू में सामने आया।
होर्मुज जलडमरूमध्य रूस के लिए चिंता का कारण क्यों?
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है और यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
यदि इस क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है। रूस के लिए यह केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक जोखिम भी है।
बॉस्फोरस भी क्यों अहम है?
दूसरा महत्वपूर्ण मार्ग बॉस्फोरस जलडमरूमध्य है, जो काला सागर को मरमारा सागर से जोड़ता है। यह रूस के लिए यूरोप और भूमध्यसागर की दिशा में एक अहम समुद्री रास्ता है।
लेकिन इस जलमार्ग पर तुर्की का नियंत्रण होने के कारण रूस लंबे समय से वैकल्पिक परिवहन मार्गों को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानता रहा है।
पहले भी हो चुकी है ऐसी पहल
रूस, भारत और ईरान पहले भी इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांजिट कॉरिडोर (INSTC) पर काम कर चुके हैं।
इस परियोजना के तहत लगभग 7200 किलोमीटर लंबा मल्टीमॉडल नेटवर्क विकसित करने की योजना थी, जिसमें:
- रूस का सेंट पीटर्सबर्ग
- ईरान का बंदर अब्बास
- और भारत का मुंबई बंदरगाह
एक दूसरे से रेल, सड़क और समुद्री मार्गों के जरिए जुड़े होते।
हालांकि, कई वर्षों बाद भी यह परियोजना पूरी तरह लागू नहीं हो सकी। अब होर्मुज संकट के कारण स्थलीय और रेल आधारित नेटवर्क को फिर से प्राथमिकता मिलने की संभावना जताई जा रही है।
क्या अफगानिस्तान और पाकिस्तान वाला मार्ग संभव है?
विश्लेषकों का मानना है कि रूस द्वारा उल्लेखित तुर्कमेनिस्तान-ईरान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान मार्ग तकनीकी रूप से संभव तो हो सकता है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां हैं:
- अफगानिस्तान की सुरक्षा स्थिति
- क्षेत्रीय राजनीतिक अस्थिरता
- पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध
- बड़े पैमाने पर रेल और लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता
इसलिए फिलहाल इसे एक रणनीतिक विचार के रूप में देखा जा रहा है, न कि तत्काल लागू होने वाली परियोजना के रूप में।
अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों का असर
यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब पश्चिमी देशों ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी शुल्क और प्रतिबंधात्मक कदमों की संभावना जताई है।
ऐसे माहौल में रूस के लिए केवल खरीदार ढूंढना ही पर्याप्त नहीं है। उसे ऐसे परिवहन मार्गों की भी जरूरत है, जो राजनीतिक तनाव, समुद्री प्रतिबंधों या सैन्य संकटों के कारण अचानक बाधित न हों।
भारत के लिए इसका क्या महत्व हो सकता है?
यदि भविष्य में कोई व्यवहारिक रूस-भारत रेल या मल्टीमॉडल कॉरिडोर विकसित होता है, तो इसके संभावित फायदे हो सकते हैं:
- रूस से ऊर्जा और सामान की आपूर्ति में विविधता
- मध्य एशिया के साथ बेहतर कनेक्टिविटी
- व्यापारिक लागत में संभावित कमी
- भारत की अंतरराष्ट्रीय ट्रांजिट और लॉजिस्टिक्स भूमिका को मजबूती
हालांकि यह सब अभी प्रारंभिक रणनीतिक चर्चा के स्तर पर है।

